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Sunday, 8 February 2015

उदबोधन


                           हार हुई तो  बढ़  इसका  सत्कार  करो
                          भिड़ने वाले ही  तो  इसको  पाते  हैं ।
                        जो गिरा हुआ है स्वयं गिरेगा क्या आगे
                        हाँ, कभी कभी उठने वाले गिर जाते  हैं।

 हार  जीत तो  भिड़ने  का  परिणाम है,
इसमें  भाई  रोने धोने का क्या काम है?
गिर कर ही उठने की ताकत मिलती  है
क्रियाशील  के  आगे  कहाँ  विराम है?

                         चोटें  तो  लगती  ही  रहती  हैं  साथी
                         जब  बढ़ने  वाले आगे    कदम  बढ़ाते हैं,
                          गिरा हुआ जो  स्वयं  गिरेगा  क्या  आगे
                          हाँ, कभी-कभी  उठने वाले गिर जाते हैं

 भिड़ने वालों  की  यह  धैर्य परीक्षा  है,
हार समझ कर इसे न धोखा खा जाना।
ठोकरें  राह को  परिभाषित  करती  है,
सरल नहीं होता  मंजिल  का पा जाना।

                       अवरोधों  का डर  न  उनको  होता  है
                       जो  आगे  बढ़ना अपना लक्ष्य बनाते  हैं
                       जो गिरा हुआ है स्वयं गिरेगा क्या आगे
                       हाँ, कभी कभी उठने वाले गिर जाते  हैं।

समय  बड़ा ही  निर्मम  होता है साथी,
दया दिखाना इसे न बिलकुल भाता है।
छुयीमुयी  के  दुर्वल  पत्तों  से   पूछो
जिन पर भी पतझड़ का दौरा आता है।

                         उन गांधी की भी छाती में बिधती गोली
                        जो सत्य अहिंसा प्रेम शांति सिखलाते हैं
                        जो गिरा हुआ है स्वयं गिरेगा क्या आगे

                        हाँ, कभी कभी उठने वाले गिर जाते हैं।

Sunday, 18 January 2015

वितृष्णा

वितृष्णा




हर बूंद पानी की
कह रही कहानी
मदहोश जोश की,
मस्त जवानी की,
खुद पर इतराने की,
और उदगम से दूर,
निजता से चूर,
अपने दो चुल्लू सागर में
डूबने उतराने की
या खुद में डूब जाने की।

यह कहानी है
बूँद भर पानी की
जिसकी चाहत है
उस ओर निकल जाने की
जिस ओर
करे न बोर
पीछे से पुकारती
ममता का शोर।

स्रोत  तो पीछे की कहानी है,
जो यों भी बेमानी है;
जो बहे,
एक जगह रुका न रहे,
वही तो असली पानी है।
स्रोत  से दूरी बढ़ाना,
अपने विरचित सागर की ओर जाना,
यही तो जीवन है
यही तो जवानी की निशानी है।



उनकी वितृष्णा पर
दुःख से मन भर गया,
जैसे आँखों के आगे,
गहरा अँधेरा,
उतर कर पसर गया।
पर किसे परवाह है?
पानी की बूँद की तो,
पीछे की ओर नहीं,
सागर की ओर राह है।


पेड़ के पत्तों का,
आकाश से ही होता लगाव।
धरती में धँसे मूल को
वे भला क्यों दें भाव?
बड़ी ही जटिल हैं
जीवन की राहें;
यहाँ उच्चता पर ही होतीं
सब की निगाहें।


उनकी वितृष्णा पर
क्यों बेकल हो?
इतना समझ लो,
तुम तो बस गुजर गया पल हो,
एक बीता हुआ कल हो,
व्यतीत हो,
पल-पल बन रहे अतीत हो।
एक व्यथा भरे  गीत,
जो भावना की ज्वाला में जल चुका।
ऐसा सूरज,
जो बूढ़ा हो चुका,
ढल चुका।
वे आगे बढ़ रहे हैं।
भविष्य की ऊँचाइयाँ चढ़ रहे हैं।
पीछे की गाथा,
पीछे ही छोड़ चुके।
निचली सीढ़ी से,
पैर हटा चुके,
अपना मुख मोड़ चुके।
आगे की चुनौतियों से
नाता जोड़ चुके।
यही सही भी है,
कि राही
आगे की ओर देखे,
आगे की राह ताके,
ऐसे में भला कौन
अँधेरी
भूली विसरी
गलियों में
लौट कर झाँके?

भावों के बंजारे!
लुटे पिटे हारे!
अब शाम हो चुकी है।
सूरज की दबंगई,
अपनी आँच खो चुकी है।
दिन भर चले हो,
मुड़-मुड़ कर सौ बार,
हाथ भी मले हो,
अब सो जाओ।
सपनों की दुनिया में खो जाओ।
नींद के सरोवर में
थकान घुल जाएगी।
आँसू बहाना नहीं,
बड़े ही जतन से
सँजोई सँवारी
लाज धुल जाएगी



यदुराज

Sunday, 11 January 2015

मेरा अजीज


मेरा अजीज़



चाहत का मेरे दिल में दरिया जहाँं पे बहता।
हरदम वहीं कहीं पर मेरा अजीज रहता।

तनहाइयों की जिल्लत, रुसवाइयों के फिकरे,
गुरबत के लाख शिकवे, खामोश हो के सहता।
हरदम वहीं कहीं पर मेरा अजीज रहता।

तू ने न खोज पाई, इस दर्द की दवाई,
बहरे हकीम से यों गूंगा मरीज कहता।
हरदम वहीं कहीं पर मेरा अजीज रहता।

फुफकारती नजर को, दुतकारती फजर को,
नुस्खा-ए-बेअसर को कैसे लजीज कहता?
हरदम वहीं कहीं पर मेरा अजीज रहता।

सेहत सकून होते, अरमा जुनून होते,
तो तेरी बेरुखी को बेशक तमीज कहता।
हरदम वहीं कहीं पर मेरा अजीज रहता।

जुमले बहुत बनाए, नुकते सभी लगाए,
वो बात कह न पाए, जो हर रकीब कहता।
हरदम वहीं कहीं पर मेरा अजीज रहता।

यदुराज
कानपुर

11 जनवरी 2015