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Thursday, 15 January 2015

मुल्ला नसरुद्दीन

 


                                    (1)

मुल्ला नसरुद्दीन से,    बोला  कमरुद्दीन।
क्या करता है हिंद जब घुस आता है चीन।।
घुस आता है चीन?’ जोर से मुल्ला चीखे,
बुजदिल मिलते नहीं कहीं भी हिंद सरीखे।
प्यार रार को कभी न करते खुल्लमखुल्ला,
बिकट पालिसी रही हिंद की  बोले मुल्ला।


                                    (2)

हिंद पुराना मुल्क है  रीति नीति  में भेद।
अप्रिय सच का बोलना मना कर गए वेद।।
मना कर गए वेद  बोलिए  मीठी  वानी,
जर जमीन को छोड़ चला जाएगा प्रानी।
बना रहे सम्मान  भले ही  लुटे खजाना,
आज लोग हों नये  हिंद है मुल्क पुराना।


                                    (3)

जो आया स्वागत किया सब में देखे राम।
जी भर लूटा सभी ने  करके कत्लेआम।।
करके कत्लेआम  लूट कर   भागे  टुच्चे
ले लो  बाकी बहुत  हिंद के  बोले बच्चे।
लुटा पिटा सौ बार फलसफा नही गँवाया
हो गया मालामाल  लूटने जो भी आया।



(4)

रग रग है पहिचानता  हिंदुस्ताँ की चीन ।
माल-टाल अब नहीं है बाकी बची जमीन।।
बाकी बची जमीन छीन लो घुड़की देकर,
लाठी जिसके हाथ भैंस वो जाए लेकर।
बुजदिल है यह मुल्क न छोड़े मीठी वानी,
हिंदुस्तानी आन  चीन ने  है  पहिचानी।


(5)

गांधी बाबा ने किया  तिस पर बंटाढार।
सत्य अहिंसा प्रेम का कीन्हा बहुत प्रचार।।
कीन्हा बहुत प्रचार सहन शक्ती भी पाई,
नेहरू ने  चीनी अवाम को  माना भाई।
भाई बन कर चीन कर रहा अपना दावा,
हिंदुस्तानी  साधे  नेहरू  गांधी  बाबा।





यदुराज

Thursday, 25 July 2013

प्यार की स्वीकृति

स्वीकृति



                                    प्यार की स्वीकृति पाकर कहीं
भाग्य ने ली अंगड़ाई है.
किसी के मन के आँगन में
बज उठी ज्यों शहनाई है.


नूपुरों ने दी है आवाज,
चहक उट्ठा प्राणों का साज,
गमकते गज़रे, गंधित केश,
ठुमकते नयन, नशे में लाज.

नयन में कजरा रजनी भरे,
हाथ पर मेंहदी ऊषा धरे,
तुम्हारा करने को श्रृंगार
दिशाएँ सज कर आई हैं.


आज अँखियाँ गाती हैं क्यों?
लजाती मुसकाती हैं क्यों?
देखने की आकुलता लिए
ये आँखें शर्माती हैं क्यों?

यही तो हैं वीणा के तार,
कि जिनकी तू मधुरिम झंकार,
पंथ पर करने नीर फुहार
देख बदरी घहराई है.


लाज का रहा न अब कुछ काम,
किसी का होठों पर है नाम,
कि जिनकी बरसों से थे, अरी,
मेघ लाया करते पैगाम.

                                    भगा दे परदों का प्रतिहार,
छोड़ दे बंधक बंदनवार,
दौड़ कर उनका स्वागत करे
कि जिनकी तू पर्छईं है.


क्यों न अब दोनों खेलें खेल?
स्वर्ग का धरती से हो मेल,
प्यार की रीति गई है जीत,
ढहा कर पाबंदी की जेल.

अब न रुक पाएगा यह ज्वार,
न बंधन स्वीकारे गा प्यार,
श्रजन ने मन का कर श्रृंगार
नेह की जयोति जलाई है.


चूर कर दिन का प्रखर गरूर,
गोद में भर के मोतीचूर,
उमंगों के रँग से भरपूर
लुटाती संध्या है सिन्दूर.

                                    हठीली दुनिया के उस पार
धार में मिल जाएगी धार.
चुम्बनों की भाषा में मौन
प्रणय ने गाथा गई है.


यदुराज सिंह बैस