Showing posts with label poem on raakhi. Show all posts
Showing posts with label poem on raakhi. Show all posts

Friday, 26 July 2013

बस मेरे पास दुआएं हैं

क्या दूँ ?

(नेफा में अपनी बहिन की पहली (और अंतिम) राखी पाने पर )

होता यदि मैं जौहरी आज गहनों से तुम्हें सजा देता
धनवान कहीं होता इतना मुँह-माँगी चीजें ला देता
यदि राज्य कहीं होता मेरा तो जाने फिर क्या-क्या देता
बस, बहिन तुम्हारी राखी पर अपना सर्वस्व लुटा देता.

पर बहिन न मैं लक्ष्मी-पति हूँ जो धन का द्वार खुला दूँ मैं,
इतने साधन उपलब्ध नहीं जो सुख के साज सजा दूँ मैं,
है पास न कोई दिव्य वस्तु बदले में जो लाकर दूँ मैं.
राखी तो बाँधी है तुमने पर तुम्हीं कहो अब क्या दूँ मैं?

ऊषा से इंद्र धनुषिया रँग के सूत्र रेशमी ले आता,
स्नेह चाँदनी में बुनवा नक्षत्र नगीने जड़वाता
नरगिसी धूप सुरमयी छाँव का रंग अमर जब मिल जाता,
यदि कर पाया होता तो मैं तुमको ऎसी साड़ी लाता

संध्या के मानसरोवर से हंसों की मृदु अँगड़ाई का,
गौरव सनेह से सना हुआ मिलता सुरभित सोना नीका,
बनवा कर अगणित अलंकार रँग देता चन्द्र जुन्हाई का
ऐसा होता यदि हो पाता उपहार तुम्हारे भाई का.

है तुलसी सी भावना नहीं, जो नेह बिंदु ही ढरकाता,
आशीर्वाद ही गा देता, मैं काश बावरा हो जाता.
बदले में तुमको क्या दूँ मैं कोई सम चिन्ह न दिखलाता,
हे बहिन! तुम्हारी राखी से मैं आज सभी हलका पाटा.

तुम फूलो-फलो समोद बहिन, चंदा तक नित्य विहार करो,
भगवान तुहारे साथ रहे, तुम सब सपने साकार करो,
शुचि स्वर्ग सरीखा सौम्य सदा अपना छोटा संसार करो,
बस मेरे पास दुआएं हैं, हे बहिन! इन्हें स्वीकार करो.

यह उषा महावर बन चमके, यह निशा नयन में काजर दे,
हर दिवस तुम्हारा होली हो, हर शाम दिवाली ला कर दे.
आकर वसंत हे बहिन! तुम्हारे आँचल में खुशियाँ भर दे,
भगवान तुम्हारे जीवन को गंगा जल सा पावन कर दे.


यदुराज सिंह बैस (३० अगस्त १९६६)




भैया मेरे क्यों तुम इतने दूर हो?




मेरे भैया


भैया मेरे क्यों तुम इतने दूर हो?

मेरी सखियाँ राग-मल्हारें गा रहीं.
झूम-झूम कर खुशियाँ आज मना रहीं.
घर-घर में राखी पर राखी डोलती.
हो विभोर बहिनें भाई से बोलतीं-

भैया तुमको आज हृदय के छोर से,
जोड़ रहीं हूँ इस राखी की डोर से,
हो कर बड़े नित्य तुम फलना-फूलना,

और बहिन को भी न कभी तुम भूलना,
पर मैं बहिन अभागिन आज उदास हूँ,
राखी ले कर जो न तुम्हारे पास हूँ.
क्यों न यहाँ आए हो? क्या मजबूर हो?
मेरे भैया क्यों तुम इतने दूर हो?


जान गई तुम भारत के रखवान हो.
मातृभूमि के सेवक सजग जवान हो.
आज नहीं तुम इस घर के हो रह रहे,

अपितु कोटि धामों के हित दुःख सह रहे,

एक बहिन को छोड़ यहाँ से ज्यों गए,
कोटि-कोटि बहिनों के भाई हो गए.
आज करोड़ों बहिनें लेकर राखियाँ,
तुम जैसे भाई की देतीं साखियाँ.

ऐसे लाखों के भाई को ताक से,
भेज रही हूँ मैं भी राखी डाक से.
बाँध सभी की राखी जब अवकाश हो,
बंधवा लेना इस राखी के तार को.
केवल राखी ही ना बाँधी हाथ में,
भेज रही हूँ लाख दुआएं साथ में.


मेरे भैया आज देश के शूर हो.


शोक नहीं तुम चाहे जितने दूर हो.





यदुराज सिंह बैस.