हिंदी गीत माला. आप मानें या न मानें पर ये ऐसे गीत हैं जो लिखे नहीं गए वल्कि लिख गए. बदली बन कर आए और बरस गए और वो सब कुछ कह गए जो हर कोई कहना चाहता है पर कह नहीं पाता. बस.
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Thursday, 12 February 2015
Sunday, 18 January 2015
सुई और भाला
सुई और भाला
उसने भोंका भाला,
सह्य था,
सह गया,
मैंने हँस कर टाला।
उससे मुझे इसी की थी आशा।
फिर क्यों करता तमाशा?
उसकी प्रतिशोधी भाले की धार,
न सकी मुझे मार,
मैं फूलता-फलता गया,
न रुका,
न झुका,
बस, अपनी राह चलता गया।
मगर तुमने-
भाला नहीं,
एक छोटी सी सुई चुभोई,
असह्य पीड़ा हुई,
आत्मा रोई।
सारा शरीर निढाल हो गया,
जैसे सब कुछ जाता रहा,
बुरा हाल हो गया।
दुश्मन का भाला
जख्मी तो कर गया,
पर दुश्मनी का कर्ज उतर गया।
पर तुम्हारी सुई,
अत्यंत घातक साबित हुई,
रोम-रोम जल उठा,
दिल-दिमाग गल उठा,
आँखें सूनी हो गईं,
भावनाएं खो गईं,
दोनों होठ सिल गए,
और तुम -
पास से छिटक कर
दूर निकल गए।
Thursday, 15 January 2015
मुल्ला नसरुद्दीन
(1)
मुल्ला नसरुद्दीन से, बोला कमरुद्दीन।
क्या करता है हिंद जब घुस आता है चीन।।
‘घुस आता है चीन?’ जोर से मुल्ला
चीखे,
बुजदिल मिलते नहीं कहीं भी हिंद सरीखे।
प्यार रार को कभी न करते खुल्लमखुल्ला,
बिकट पालिसी रही हिंद की बोले मुल्ला।
(2)
हिंद पुराना मुल्क है रीति नीति
में भेद।
अप्रिय सच का बोलना मना कर गए वेद।।
मना कर गए वेद बोलिए मीठी वानी,
जर जमीन को छोड़ चला जाएगा प्रानी।
बना रहे सम्मान भले ही
लुटे खजाना,
आज लोग हों नये हिंद है मुल्क पुराना।
(3)
जो आया स्वागत किया सब में देखे राम।
जी भर लूटा सभी ने करके कत्लेआम।।
करके कत्लेआम लूट कर
भागे टुच्चे
ले लो
बाकी बहुत हिंद के बोले बच्चे।
लुटा पिटा सौ बार फलसफा नही गँवाया
हो गया मालामाल लूटने जो भी आया।
(4)
रग रग है पहिचानता हिंदुस्ताँ की चीन ।
माल-टाल अब नहीं है बाकी बची जमीन।।
बाकी बची जमीन छीन लो घुड़की देकर,
लाठी जिसके हाथ भैंस वो जाए लेकर।
बुजदिल है यह मुल्क न छोड़े मीठी वानी,
हिंदुस्तानी आन चीन ने
है पहिचानी।
(5)
गांधी बाबा ने किया तिस पर बंटाढार।
सत्य अहिंसा प्रेम का कीन्हा बहुत प्रचार।।
कीन्हा बहुत प्रचार सहन शक्ती भी पाई,
नेहरू ने चीनी अवाम को
माना भाई।
भाई बन कर चीन कर रहा अपना दावा,
हिंदुस्तानी साधे नेहरू गांधी बाबा।
यदुराज
Monday, 1 July 2013
नया मोड़ (जिंदगी में फिर नई रौनक जगी है.)
नया
मोड़
जिंदगी
में फिर नई रौनक जगी है.
हर समय छाई निराशा
की घनाली
जिंदगी में फिर
नई रौनक जगी है.
होठ जिन पर मरण की ही बोलियाँ थीं,
अब वरण की लगे हैं कहने कहानी.
हर दिशा में लुटी कुंठित भावना भी,
चहक उट्ठी समय से पा कर जवानी.
भुला कर के वेदना
सदियों पुरानी
नए सपनों में
पुनः आँखें लगी हैं
जिंदगी में फिर
नई रौनक जगी है.
छली चाहत भी न आहत कर सकी है,
डगमगाए कदम क्यों कि संभल चुके हैं.
ह्रदय में विश्वास का दरिया बहाने-
स्नेह-घन मन में बरसने चल चुके हैं.
नयन में फिर छा
गए अभिनव नज़ारे,
इन्द्रधनुषी रंगों
नें दुनिया रंगी है.
जिंदगी में फिर
नई रौनक जगी है.
हर चमन को एक दिन पतझड़ सताता,
छोड़ जाते पीत-पात प्रसून सारे;
भूल कर बरवादियों के वे नज़ारे,
क्यों न महकें फिर वही उपवन हमारे?
चौंक कर उड़ जाएगी
सारी खुमारी,
स्वप्न में आभास
की गोली दगी है.
जिंदगी में फिर
नई रौनक जगी है.
यदुराज सिंह बैस
Tuesday, 25 June 2013
कहानी THE STORY OF LIFE
कहानी
इधर बुढ़ापा,
उधर जवानी,
इसी के बीच
सारी कहानी.
तुम हो रहे बड़े,
अपने पैरों पर खड़े,
और मैं बूढ़ा
जो उत्तरोत्तर
जीर्ण-जर्जर हो रहा,
योवन का सारा सार
खो रहा.
तुम्हें बढ़ता देखना
सुहाता है,
तुम्हारा विकास,
तुम्हारा तेज,
मन को भाता है,
पर मेरा तजुरबा
कुछ दीपों के जरिए
कुछ समझाता है,
एक अलग कहानी सुनाता है,
और मुझे हर समय डराता है.
एक रात
पास-पास
दो दीये वले,
पर जिसकी लौ
तेज रही
सारे शलभ
उसी की ओर चले,
उसी पर मंडराए,
उसी में जा
जले.
पर ये दिव्यता
के चोर,
मूर्ख बरजोर,
जब बिफर कर आते
हैं,
लौ पर छाजाते
हैं,
तो सबसे पहले
तेज दीप्ति
वाला
दीप ही बुझाते
हैं.
यही देख कर
लगता है डर.
दूसरी ओर
एक दीप
जिसमें भरा है
लबालब तेल,
और दूसरा,
जिसके तेल का
समाप्ति पर है खेल,
दोनों पर ही
समय का शिकंजा
है,
जो निरंतर
जकड़ता
बेरहम पंजा है.
तुम्हारा तेज
पराक्रम के
शिखर की ओर,
थामें पौरुष की
सबल डोर,
जब आगे बढेगा,
तब मेरा सूरज
शनैः-शनैः
ढलेगा.
और
अँधेरे या
शून्यता की छाया गढ़ेगा.
पर ऐसा सुना है
कि
तब भी
वह तत्व,
जो अजन्मा है,
अक्षय है,
अविनाशी है,
सलामत रहेगा.
क्या पता-
फिर किसी फूल
या कांटे के रूप में,
यह रूह फिर आए,
और बिफराए मौसमों
की मार सहे,
या
फिर किन्ही
आँखों में आंसू बन छलके,
या किसी
मेहनतकश का स्वेद बन बहे,
या एक नयी कहानी
बने,
जिसको समय
अपने निरंकुश
लहजे में-
लिखे,
पढ़े,
या कहे.
यदुराज सिंह
बैस
Tuesday, 18 June 2013
उठो राही, चलें, अब कोई न भय है. NOW IS THE TIME
उठो राही
दूरिओं की बात थी कुछ,
मौन निष्ठुर रात थी कुछ
वह अँधेरा,
बन सबेरा,
आज लेकर आ गया रवि का उदय है.
उठो राही, चलें, अब
कोई न भय है.
राह हँस कर मौन है जब,
रोक सकता कौन है तब,
सभी सपने
बने अपने,
सुरभि संकुल पवन भी अब त्वरण मय है.
उठो राही, चलें, अब कोई न भय है.
भावना का यह उभरना-
झर रहा बन किरण झरना,
और रुक-रुक
झूम झुक-झुक
बिहारती फिरती फ़िजाएँ भर प्रणय हैं.
उठो राही, चलें, अब
कोई न भय है.
रोशनी से तर प्रभाती-
स्वागतम के गीत गाती,
और मंजिल,
खोल कर दिल,
स्वयं पथ में आ खड़ी होकर सदय है.
उठो राही, चलें, अब कोई न भय है.
अब हमें करनी न देरी,
राह जोती राह मेरी,
हर विजय का-
फूल महका,
सुरभि से सन, लोटती पथ पर मलय है.
उठो राही, चलें, अब
कोई न भय है.
यदुराज सिंह बैस
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