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Friday, 28 June 2013

उद्बोधन हार हुई तो बढ़ इसका सत्कार करो A Poem of Encouragement




उद्बोधन




हार हुई तो बढ़ इसका सत्कार करो
भिड़ने वाले ही तो इसको पाते हैं .
जो गिरा हुआ है स्वयं, गिरेगा क्या आगे
हाँ, कभी कभी उठने वाले गिर जाते हैं.


हार जीत  तो भिड़ने का  परिणाम है,
इसमें  भई रोने धोने का क्या काम है.
गिर कर ही उठने की ताकत मिलती है
क्रियाशील  के  आगे  कहाँ  विराम है.

चोटें तो  लगती ही रहती हैं  साथी
जब बढ़ने वाले आगे कदम बढ़ाते हैं.
जो गिरा हुआ है स्वयं, गिरेगा क्या आगे
हाँ, कभी कभी उठने वाले गिर जाते हैं.


भिड़ने वालों की यह धैर्य परीक्षा है,
हार समझ कर इसे न धोका खा जाना.
ठोकरें राह को परिभाषित करती हैं,
सरल नहीं होता मंजिल का पाजाना.

अवरोधों  का  डर  न  उनको  होता  है,
जो आगे बढ़ना अपना लक्ष्य बनाते हैं.
            जो गिरा हुआ है स्वयं, गिरेगा क्या आगे
हाँ, कभी कभी उठने वाले गिर जाते हैं.


समय बड़ा ही  निर्मम  होता है साथी
दया दिखाना इसे न बिलकुल भाता है
छुईमुई   के   दुर्बल   पत्तों  से   पूछो -
जिन पर भी पतझड़ का मौसम आता है

               उन गाँधी की भी छाती में बिधती  गोली
               जो सत्य अहिंसा प्रेम शांति सिखलाते हैं
जो गिरा हुआ है स्वयं, गिरेगा क्या आगे
हाँ, कभी कभी  उठने वाले  गिर  जाते हैं.


                        यदुराज सिंह बैस







Tuesday, 18 June 2013

तहजीब

तहजीब



मार्गों और मीलों की
गिद्ध और चीलों की
अभियोगों-वकीलों की
यह मिश्रित तहजीब -
जिसमें
अभिशप्त टीलों का
ताबूतों-कीलों का
हठी दलीलों का
विशेष महत्व है.

चारों ओर
भयानक शोर ही शोर है
चोरों के हाथों में ज़ोर है
ईमान की धार कमजोर है
धर्म के नाम पर दंगे
सौभाग्य के फ़रिश्ते नंगे
बगिया के माली
करते सुगंध की दलाली
सीधी-सादी जनता की बदहाली
जेब भी खाली
और पेट भी खाली
मगर भ्रष्टों के घर
हर दिन होली
हर रात दीवाली.

यह खुशहाली भी अजीव है;
ऐसी यह मिश्रित तहजीव है

हर गली में
हर सड़क पर
हर बाज़ार में
जनता दरबार में
सरकार में
लोंगों का
अजीबोगरीब रोगों का
भोग्य-अभोग्य भोगों का
ताँता लगा है
हम किसके ख़िलाफ लड़ जाहे हैं?
और इतना शोर मचाकर
हम किसे पकड़ रहे हैं?
आखिर यह दौड़
किधर जा रही है?
यह कैसी मानसिकता
जो न रानी है
न चेरी है
न तेरी है
न मेरी है
न कोई इससे दूर है
न कोई इसके पास है
आखिर सब क्या है?
कोई तो बताये-
यह कैसी तहजीब है?


यदुराज सिंह बैस