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Wednesday, 19 June 2013

कल्पना और यथार्थ (शून्य का विकराल मुख इसे भी निगलने जा रहा है)

कल्पना और यथार्थ



त्रिकाल की गिरफ्त से परे
किसी अनजाने आयाम में पल रहा
कल्पना के सांचे में ढल रहा
मेरी असंख्य रचनाओं का संसार
अपनी
अपरिहार्य नियति की ओर
अब चलने लगा है,
पर
त्रिकाल के ही घर में गढ़ा गया
और अनुभव की रोशनी में पढ़ा गया
यथार्थ-
क्या सचमुच सत्य है?
यथार्थ है?
या
यह भी
किसी कुंठित कल्पना का,
या किसी विद्रोही जल्पना का,
उड़ान भरने का
महज पुरुषार्थ है.
क्योंकि
इसकी ओर भी
परिणति का वही दृश्य
या

अंतिम अंजाम का वही दैत्य
मुंह फाड़े आ रहा है,
और
उसी शून्य का विकराल मुख
इसे भी निगलने जा रहा है.


यदुराज सिंह बैस