हिंदी गीत माला. आप मानें या न मानें पर ये ऐसे गीत हैं जो लिखे नहीं गए वल्कि लिख गए. बदली बन कर आए और बरस गए और वो सब कुछ कह गए जो हर कोई कहना चाहता है पर कह नहीं पाता. बस.
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Thursday, 12 February 2015
Wednesday, 28 January 2015
नफ़रत
प्यार नहीं सौम्य!
नफ़रत.
तुम मुझसे नफ़रत करो!
अगर तुम प्यार करोगे,
तो
तुम्हारे साथ होने का भरम होगा,
अपनी सामर्थ्य पर भरोसा
उत्तरोत्तर कम होगा,
हाथ
हर वक्त अन्य हाथों को तरसेंगे,
परिणामतः निराशा होगी
और आँखों से मेघ बरसेंगे.
जीवन की जंग में
अपनी लड़ाई जब खुद न लड़ पाऊँगा,
जब तुम न साथ होओगे,
तो क्या करूंगा,
कहाँ जाऊंगा?
प्यार में विछोह की
संभावना परम होगी,
और अनिवार्यतः
आसरे की उम्मीदें
हर दम बेदम होंगी,
जो दिल भरा होगा
तेरे प्यार के आश्वासन से,
कैसे निपट पाएगा
उस दुरूह एकाकीपन से?
पर तुम्हारी नफ़रत
चुनौती देगी लड़ने की
घने दुर्गम बनों में
मार्ग बना चलने की
पीछे मुड़कर देखने की
नौबत न आएगी तब,
अपितु हिम्मत होगी -
आगे ही आगे बढ़ने की.
ये प्यार तो कछुये का सिर है,
पता नहीं कब बाहर
कब अन्दर,
पर नफ़रत तो हर हाल नफ़रत है,
मुंह छिपाना इसकी न फितरत है,
जो कुछ है
खुला खेल है
छाती ठोक कर,
और डंके की चोट पर.
न कोई चोंचला,
न ही दिखावा,
हर समय है
बस दहकता हुआ लावा.
इसलिए
नफ़रत है हर हाल पूरी खरी,
हर वक़्त चेतावनी भरी.
हजारों गिले-शिकवे,
लाखों शिकायतें,
अशंख्य अपेक्षाएं,
ढेरों उम्मीदें,
सतत परीक्षाएं,
ये ही तो प्यार की किताब के सफे हैं,
जिन पर उकरे
ये प्यार के अजीव फलसफे हैं.
मुझे नहीं चाहिए ऐसा प्यार.
प्यार में-
वियोग है,
विछोह है,
धोका है,
द्रोह-विद्रोह है,
प्रायः परकीयता है,
रकीब होने की
सुदृढ़ संभावना है,
जो अपने आप में एक दुखती कथा है,
प्यार में उलाहने हैं,
चुभते हुए ताने हैं,
तारे तोड़ लाने के वादे हैं,
या मायावी तराने हैं,
बिंदास प्रलोभन हैं,
और अक्सर
टूटे हुए दिल हैं
और बेचैन मन हैं.
प्यार सम्मोहन है,
सुध-बुध विसराता है,
अपनी मन-मानी कराता है
करके अचेत,
जब कि नफ़रत
सिर पर तना डंडा है,
चेतावनी का झंडा है,
सदा करता सचेत.
प्यार को तो
हर पल कुर्बानियों की आग में तपना है,
तिल-तिल कर पल छिन जीना है
मरना है,
और अंततः
नफ़रत में हि बदलना है,
जबकि
नफ़रत का रूप
सदा एक हि रहता है-
नफ़रत.
इसलिए सौम्य!
तुम प्यार का बेहूदा भरम न भरो,
अभी से नफ़रत करो.
प्यार तो आरंभिक चोंचला है,
प्यार भावनात्मक ढकोसला है,
अहं से संपोषित दुनिया में-
प्यार बस दिखावा है,
स्वार्थी छलावा है,
खोखला है.
जब कि नफ़रत-
लौकिकता के अंत का सत्य है,
और प्यार का ही
परिवर्तित,
परिष्कृत रूप है,
और प्रायः
हर प्यार का अंतिम लक्ष्य है.
नफरत अस्तित्व की ज़रूरत है.
गौर से देखो तो पाओ गे-
कि हर दर्पण में प्रतिविम्बित
नफ़रत ही स्पर्धा की सूरत है,
इसलिए सौम्य!
तुम अंत का यथार्थ चुनो,
और प्यार का अभिनय छोड़कर
नफरत के तानें बुनो.
प्यार तो छलिया है,
धोका है,
दिखावों-आडम्बरों का खोका है,
मन का यह बड़पेटू बच्चा-
हर समय भूखा ही रहता है.
ऐसा खेत
जो भरपूर खाद पानी मिलने पर भी,
बंजर ही रहता है
सूखा ही रहता है.
प्यार तो भावना का गिरगिट है,
पल-पल रंग बदलता है,
प्यार एक मोहक छलावा है
जो रूप बदल-बदल कर छलता है.
प्यार ऐसा परजीवी है
जो खुद पर नहीं,
अन्य पर जीता है,
और चटकारे लेते हुए
एक-दूजे का खून पीता है.
अस्तु सौम्य!
मत करो ढोंग इस प्यार का.
नफ़रत की राह सीधी है,
नफ़रत की बात सच्ची है,
नफ़रत में न कोई इच्छा है,
और न ही कोई
अपेक्षा-परीक्षा है.
इसलिए सौम्य,
तुम मुझसे नफ़रत करो,
फिर तुम्हारी राह तुम्हारी होगी,
और मेरी
सिर्फ मेरी.
मैं अपने में खुश रहूँगा,
तुम अपने में,
न किसी का दिल टूटेगा,
न ही भाग्य फूटेगा,
न झंझट,
न झमेला,
बस नफ़रत
सौम्य,
नफ़रत,
Monday, 26 January 2015
विचार
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विचार
Saturday, 24 January 2015
Thursday, 15 January 2015
मुल्ला नसरुद्दीन
(1)
मुल्ला नसरुद्दीन से, बोला कमरुद्दीन।
क्या करता है हिंद जब घुस आता है चीन।।
‘घुस आता है चीन?’ जोर से मुल्ला
चीखे,
बुजदिल मिलते नहीं कहीं भी हिंद सरीखे।
प्यार रार को कभी न करते खुल्लमखुल्ला,
बिकट पालिसी रही हिंद की बोले मुल्ला।
(2)
हिंद पुराना मुल्क है रीति नीति
में भेद।
अप्रिय सच का बोलना मना कर गए वेद।।
मना कर गए वेद बोलिए मीठी वानी,
जर जमीन को छोड़ चला जाएगा प्रानी।
बना रहे सम्मान भले ही
लुटे खजाना,
आज लोग हों नये हिंद है मुल्क पुराना।
(3)
जो आया स्वागत किया सब में देखे राम।
जी भर लूटा सभी ने करके कत्लेआम।।
करके कत्लेआम लूट कर
भागे टुच्चे
ले लो
बाकी बहुत हिंद के बोले बच्चे।
लुटा पिटा सौ बार फलसफा नही गँवाया
हो गया मालामाल लूटने जो भी आया।
(4)
रग रग है पहिचानता हिंदुस्ताँ की चीन ।
माल-टाल अब नहीं है बाकी बची जमीन।।
बाकी बची जमीन छीन लो घुड़की देकर,
लाठी जिसके हाथ भैंस वो जाए लेकर।
बुजदिल है यह मुल्क न छोड़े मीठी वानी,
हिंदुस्तानी आन चीन ने
है पहिचानी।
(5)
गांधी बाबा ने किया तिस पर बंटाढार।
सत्य अहिंसा प्रेम का कीन्हा बहुत प्रचार।।
कीन्हा बहुत प्रचार सहन शक्ती भी पाई,
नेहरू ने चीनी अवाम को
माना भाई।
भाई बन कर चीन कर रहा अपना दावा,
हिंदुस्तानी साधे नेहरू गांधी बाबा।
यदुराज
Wednesday, 17 July 2013
सुई और भाला (उसने भोंका भाला, सह्य था, सह गया, मैनें हँस कर टाला.)
सुई और भाला
उसने भोंका भाला,
सह्य था,
सह गया,
मैनें हँस कर टाला.
उससे मुझे इसी की थी आशा,
फिर किस बात का करता तमाशा?
उसकी प्रतिशोधी भाले की धार,
न सकी मुझे मार,
मैं फूलता-फलता गया.
न रुका,
न झुका,
बस, मंजिल की ओर चलता गया.
मगर तुमने-
भाला नहीं
एक छोटी सी सुई चुभोई,
असह्य पीड़ा हुई,
आत्मा रोई.
सारा शरीर निढाल हो गया,
जैसे सब कुछ जाता रहा,
बुरा हाल हो गया.
दुश्मन का भाला
जख्मी तो कर गया,
पर दुश्मनी का ऋण उतर गया.
पर तुम्हारी सुई -
अत्यंत घातक साबित हुई,
रोम-रोम जल उठा,
दिल-दिमाक गल उठा,
आँखें सूनी हो गईं,
भावनाएं खो गईं,
दोनों होठ सिल गए,
और तुम –
भले नजदीक रहे
पर बहुत दूर निकल गए.
यदुराज सिंह बैस
Saturday, 6 July 2013
कैसे मिलोगे?
रक्त से धोया हुआ अनुराग होगा,
वक्ष पर सीमांत जय का दाग होगा.
दृष्टि में होगा जयी भारत हमारा,
और अधरों पर अमर जय-हिन्द नारा.
भाल पर दैदीप्त नेफा की कहानी,
हड्डियों तक में धँसी हिन्दोस्तानी.
और लोहित भूमि का सन्देश लेकर-
जब कभी आऊँगा मैं अवकाश ले घर,
खोज कर तुमको मिलूंगा जहाँ होगे,
देखता तब तुम मुझे कैसे मिलोगे?
दूर होगे खून के धब्बों से डर के.
या गले से आ मिलोगे दौड़ कर के.
दर्द के अंदाज़ दिल के पार होंगे,
या की मेरे घाव भी श्रंगार होंगे.
युद्ध की अटखेलियाँ क्या खल उठेंगी?
गर्व से दीवालियाँ या जल उठेंगी?
देखता तब कौन सा उपचार दोगे?
त्याग दोगे या कि मुझको प्यार दोगे?
यदुराज सिंह बैस
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