Wednesday, 17 July 2013

सुई और भाला (उसने भोंका भाला, सह्य था, सह गया, मैनें हँस कर टाला.)

सुई और भाला



उसने भोंका भाला,
सह्य था,
सह गया,
मैनें हँस कर टाला.
उससे मुझे इसी की थी आशा,
फिर किस बात का करता तमाशा?
उसकी प्रतिशोधी भाले की धार,
न सकी मुझे मार,
मैं फूलता-फलता गया.
न रुका,
न झुका,
बस, मंजिल की ओर चलता गया.

मगर तुमने-
भाला नहीं
एक छोटी सी सुई चुभोई,
असह्य पीड़ा हुई,
आत्मा रोई.
सारा शरीर निढाल हो गया,
जैसे सब कुछ जाता रहा,
बुरा हाल हो गया.

दुश्मन का भाला
जख्मी तो कर गया,
पर दुश्मनी का ऋण उतर गया.
पर तुम्हारी सुई -
अत्यंत घातक साबित हुई,
रोम-रोम जल उठा,
दिल-दिमाक गल उठा,
आँखें सूनी हो गईं,
भावनाएं खो गईं,
दोनों होठ सिल गए,
और तुम
भले नजदीक रहे
पर बहुत दूर निकल गए.


यदुराज सिंह बैस


Monday, 15 July 2013

पानी का बुलबुला, हवा मिली फूल गया

बुलबुला

 

पानी का बुलबुला
हवा मिली
फूल गया,
अस्तित्व बन गया,
अहंकार तन गया,
असलियत भूल गया.
पानी की झिल्ली
उड़ाने लगी खिल्ली,
और जब पानी का
पतला नाज़ुक खोल
रिसा या टूटा,
हवा निकली
बुलबुला फूटा.
अस्तित्व मिट गया,
अहंकार पिट गया,
शून्य में सिमट गया.

इतना ही कथ्य था,
इस नन्ही कहानी में,
कि
हवा-
हवा में मिली,
और पानी-
पानी में.

बुलबुले का बनना,
पानी से प्रथक,
एक सर्वथा अलग
अस्तित्व का तनना,
फूलना-इतराना,
अनंतता के आगे,
छाती फुलाना,
आँखें मटकाना,
और इस सब के बाद
अचानक फूट जाना,
अलग अस्मिता का अड़ियल अहंकार
स्वप्न वत टूट जाना,
वैयक्तिकता की इकाई का
अनंत में खो जाना,
और द्वेत मिट कर
अद्वेत हो जाना,
आदि आदि
कुछ कहता है-
कि सारे बुलबुलों में
सिर्फ हवा-पानी रहता है.
ये नाम और रूप
मिटने के लिए ही बनते हैं,
और ये दंभ भरे आकार
सपनों की भांति ही तनते हैं.
बुलबुले का ये जीवन
असल में फानी है,
कहने सुनने के लिए
एक निरर्थक कहानी है.
समय आकाश द्वारा
रची मृगतृष्णा है,
न ही बुलबुला है,
और न ही कहीं पानी है.
अगर कुछ है तो
सिर्फ एक सत है.
और यही ऋषि-मुनिओं का मत है.
यही सत सबका आधार है,
इन बनते बिगड़ते
नाम रूपों का सार है,
वह तो अमिट है,
न तो बनता है
न बिगड़ता है,
सिर्फ वही है
जो हर हाल में बना रहता है.

जब मिलन का,
बिछोह का,
समस्त माया मोह का
हाल यही होना है,
तो मेरे भाई-
किस बात का ये रोना-धोना है.


यदुराज सिंह बैस





Saturday, 6 July 2013

कैसे मिलोगे?

कैसे मिलोगे?


रक्त से धोया हुआ अनुराग होगा,
वक्ष पर सीमांत जय का दाग होगा.

दृष्टि में होगा जयी भारत हमारा,
और अधरों पर अमर जय-हिन्द नारा.

भाल पर दैदीप्त नेफा की कहानी,
हड्डियों तक में धँसी हिन्दोस्तानी.

और लोहित भूमि का सन्देश लेकर-
जब कभी आऊँगा मैं अवकाश ले घर,

खोज कर तुमको मिलूंगा जहाँ होगे,
देखता तब तुम मुझे कैसे मिलोगे?

दूर होगे खून के धब्बों से डर के.
या गले से आ मिलोगे दौड़ कर के.

दर्द के अंदाज़ दिल के पार होंगे,
या की मेरे घाव भी श्रंगार होंगे.

युद्ध की अटखेलियाँ क्या खल उठेंगी?
गर्व से दीवालियाँ या जल उठेंगी?

देखता तब कौन सा उपचार दोगे?
त्याग दोगे या कि मुझको प्यार दोगे?




यदुराज सिंह बैस



कोई है?

कोई है?


है कोई
जो मेरे पास आए?
मेरे अभिषप्त हाथों से खिसक रही,
हवा के झोंकों से बुझ रही,
यह मशाल उठाए,
उसे फिर जलाए,
और आगे ले जाए?
है कहीं कोई?

चारों ओर
हो रहा कनफोड़ू शोर,
अँधेरा ही अँधेरा है.
रोशनी की हर किरण को
घने कुहासे ने घेरा है.
एक आंधी चल रही है.
उखड़ी हुई कब्रों से
सड़ांध निकल रही है.
और
भीड़ भरे चौराहे पर
विनय और शील की
होली जल रही है.

ऐसे में
क्या कहीं कोई है,
जो मेरे पास आए?
मेरी गाँठ में बंधे
इस पारस को चुराए?
और इस अँधेरे के उस पार जाकर
लोहे के दिलों को
सोने का बनाए?

है कोई?


यदुराज सिंह बैस


Tuesday, 2 July 2013

दीपावली को एक सैनिक का सलाम

दीपावली को एक सैनिक का सलाम


(एक पूर्ण सैनिक के रूप में १९६६ की दीवाली मेरी पहली दीवाली थी. इसे मैं घर पर मनाना चाहता था, पर छुट्टी नहीं मिल सकी. नेफा (N.E.F.A.) में तनाव बढ़ गया था. तब इस कविता द्वारा मैंने अपने पिता जी को दीपावली की शुभ कामनाएं भेजी थीं.)


आज नहीं, कल नहीं, अपितु सारे जीवन
में छाई इसके मधुराधर की लाली हो,
दीप-दीप में सौख्य दीप्ति दीपित करके
हे देव! आपको शुभ आगम दीवाली हो.

द्वार-द्वार पर जला दीपकों की माला,
कूप तड़ाग मरघटी तक चमका देना,
और अंत में नाम हमारा लेकर भी,
इस नभ में बस दो किरणे दमका देना.

इस ब्रह्मपुत्र की लहर-लहर बन किरण ज्योति
इन घने बनो के तरुण प्रसूनो की लाली,
इस हिमगिरि के कन्दरा श्रंग महका देगी,
बन जाए गी बस वही हमारी दीवाली.

यह है विराट का द्वार यहाँ पर शांत मलय
भी चट्टानों से टकरा करता सिंह नाद,
यह है नेफा की भूमि जहां हरियाली भी
अपने पातो पर रखती है रक्तिम प्रमाद.

ये दूर-दूर तक गगन गम्य उत्तुंग श्रंग,
ये मलय, विहंसते फूल और अमुखर कलियाँ,
यह शोणित बिंदु प्रलिप्त स्वेत हिम अमर चूर
बस यही झलकती भारत की दीपावलियाँ.

है ऐक-ऐक की विध्वंसक नलियाँ नीचे
जाग्रत राडार हरदम, ऊपर गरजे हंटर,
यह आग उगलती चली मिसाइल है फिर भी
हैं गरज रहे बेधड़क नेट तूफानी वर.

इन वैम्पायर मिस्टीयर और कैनबरा में
है धुआं धड़ाकों की ज्वलंत आभा राजी
वायारलेसों के इंगित पर जो भवक उठे
बस ऎसी है हम लोगों की अतिशवाजी.

ऊपर-नीचे दायें-वाएं आगे-पीछे,
उठते-गिरते एरोबेटिक करते विमान
हैं आसमान की छाती पर चिंघाड़ रहे
लेकर अंतर में नन्ही सी बस एक जान.

है चौतरफा छाया अनंत तक गगन एक
बस साथ देश का प्रेम, कर्म, दो-एक याद
कुछ और साथ लेकर आए हैं ये अपने
आदेश, कफ़न, स्नेह और आशीर्वाद.

हर ओर सुरक्षा दीपक में दे प्राण-स्नेह
अपनी छोटी सी आयु बना बाती डाली,
जीवन की आहुति देने को चल पड़े आज
ये वीर जलाने भारत माँ की दीवाली.

ये नहीं अंधेरी रात दीपकों से सज्जित
यह नहीं मात्र त्यौहार मनाये जाने को
यह है अतीत का गर्व, देश का भाल तिलक
ये दीप हार माँ को पहिनाए जाने को.

ये हार कि जिसके दीप-दीप में ज्योति जली
माँ के गुदड़ी के लालों के बलिदानों से,
यह लाली लाख सुहाग समर्पण की प्रतीक
ये बनी बातियाँ हैं राखी के तानो से.

इनमे खुशिओं का मोद, विफलता का प्रलाप
इनमें जलने की शक्ति, जलाने की क्षमता,
इनके अंतर में स्नेह दीप्ति के साथ जलन
इनके दीपन में राह दिखाने की ममता.

इनकी लौ में ऊपर उठने की अमिट चाह
पर इधर-उधर नीचे भी कर देते प्रकाश,
बस यही हमारे भारत का उत्तम प्रतीक
बस यही हमारी एक भविष्यत् की पिपास.

बस यही की आंधी आने पर दे बुझा किन्तु
जब तक जीवन है रवि सी नित्य कला देंगे,
जो करें प्रकाशित विश्व हरें औरों का तम
हम बुझने से पहले लाखों दीप जला देंगे.

बस यही हमारी दीवाली का है परिचय
इसको इक रश्म समझ कर ही न मना लेना,
पर शश्य श्यामला भारत माँ का समझ गर्व
इसके स्वागत में दिल के द्वार सजा लेना.

हम दूर, बहुत ही दूर, हिमालय में बैठे
अपने कर्त्तव्य प्रदीप असंख्य बना लेंगे,
हम सब को भूल मनावें दीपावली आप,
हम भी दीवाली अपनी यहाँ मना लेंगे.

हों आप सुखी, हो लोक सुखी, हों सुखी सभी,
शुभ सब को सब की मुश्कानों की लाली हो,
हर दीप-दीप में सौख्य दीप्ति जल उठे स्वयं,
हे देव! आपको शुभ आगम दीवाली हो.




यदुराज सिंह बैस.
(कविता लिखने की तिथि : १९ अक्टूबर १९६६)



Monday, 1 July 2013

पानी (पानी ने विसार दी अपने वैभव की कहानी)




पानी


एक सागर
सागर में गागर
गागर में पानी
पानी ने विसार दी
अपने वैभव की कहानी
हो गया गागर
खो गया सागर

गागर के रंग रंगा पानी का रंग
गागर का अंग बना पानी का अंग
गागर का नाम हुआ पानी का नाम
गागर का काम हुआ पानी का काम

गागर की श्रेष्ठता
या फिर औकात
पानी का बनी धर्म
रूप, रंग, जात

दोनों मिल एक बने
एक से अनेक बने
कुनवें कबीले बने
गड्ढे और टीले बने
पेड़ में पात हुए
और मुक्के-लात हुए

एक अंधा बन्दर
गागर के अन्दर
मचाए उत्पात
और हुई शुरूआत
रोने और हँसने की
मायाजाल रचने की
और उसमें फसने की
कीचड़ बनाने की
कीचड़ में धंसने की
अहंकार पांव फैलाने लगा
कर्ता और भोक्ता बन गाने लगा
तू-तू और मैं-मैं में रार हुई
द्वंदों की रार ही संसार हुई

और तब एक दिन
गागर टिघल गई
सपने निगल गई
गागर का अस्तित्व
आरोपित व्यक्तित्व
सब का सब खो गया
अन्दर का पानी भी
सागर में मिल कर
फिर सागर हो गया



यदुराज सिंह बैस




नया मोड़ (जिंदगी में फिर नई रौनक जगी है.)



नया मोड़


जिंदगी में फिर नई रौनक जगी है.


हर समय छाई निराशा की घनाली
त्याग कर के नयन औचक सी भगी है.
जिंदगी में फिर नई रौनक जगी है.


होठ जिन पर मरण की ही बोलियाँ थीं,
अब वरण की लगे हैं कहने कहानी.
हर दिशा में लुटी कुंठित भावना भी,
चहक उट्ठी समय से पा कर जवानी.

भुला कर के वेदना सदियों पुरानी
नए सपनों में पुनः आँखें लगी हैं
जिंदगी में फिर नई रौनक जगी है.


छली चाहत भी न आहत कर सकी है,
डगमगाए कदम क्यों कि संभल चुके हैं.
ह्रदय में विश्वास का दरिया बहाने-
स्नेह-घन मन में बरसने चल चुके हैं.

नयन में फिर छा गए अभिनव नज़ारे,
इन्द्रधनुषी रंगों नें दुनिया रंगी है.
जिंदगी में फिर नई रौनक जगी है.


हर चमन को एक दिन पतझड़ सताता,
छोड़ जाते पीत-पात प्रसून सारे;
भूल कर बरवादियों के वे नज़ारे,
क्यों न महकें फिर वही उपवन हमारे?

चौंक कर उड़ जाएगी सारी खुमारी,
स्वप्न में आभास की गोली दगी है.
जिंदगी में फिर नई रौनक जगी है.



                  यदुराज सिंह बैस