Tuesday, 2 July 2013

दीपावली को एक सैनिक का सलाम

दीपावली को एक सैनिक का सलाम


(एक पूर्ण सैनिक के रूप में १९६६ की दीवाली मेरी पहली दीवाली थी. इसे मैं घर पर मनाना चाहता था, पर छुट्टी नहीं मिल सकी. नेफा (N.E.F.A.) में तनाव बढ़ गया था. तब इस कविता द्वारा मैंने अपने पिता जी को दीपावली की शुभ कामनाएं भेजी थीं.)


आज नहीं, कल नहीं, अपितु सारे जीवन
में छाई इसके मधुराधर की लाली हो,
दीप-दीप में सौख्य दीप्ति दीपित करके
हे देव! आपको शुभ आगम दीवाली हो.

द्वार-द्वार पर जला दीपकों की माला,
कूप तड़ाग मरघटी तक चमका देना,
और अंत में नाम हमारा लेकर भी,
इस नभ में बस दो किरणे दमका देना.

इस ब्रह्मपुत्र की लहर-लहर बन किरण ज्योति
इन घने बनो के तरुण प्रसूनो की लाली,
इस हिमगिरि के कन्दरा श्रंग महका देगी,
बन जाए गी बस वही हमारी दीवाली.

यह है विराट का द्वार यहाँ पर शांत मलय
भी चट्टानों से टकरा करता सिंह नाद,
यह है नेफा की भूमि जहां हरियाली भी
अपने पातो पर रखती है रक्तिम प्रमाद.

ये दूर-दूर तक गगन गम्य उत्तुंग श्रंग,
ये मलय, विहंसते फूल और अमुखर कलियाँ,
यह शोणित बिंदु प्रलिप्त स्वेत हिम अमर चूर
बस यही झलकती भारत की दीपावलियाँ.

है ऐक-ऐक की विध्वंसक नलियाँ नीचे
जाग्रत राडार हरदम, ऊपर गरजे हंटर,
यह आग उगलती चली मिसाइल है फिर भी
हैं गरज रहे बेधड़क नेट तूफानी वर.

इन वैम्पायर मिस्टीयर और कैनबरा में
है धुआं धड़ाकों की ज्वलंत आभा राजी
वायारलेसों के इंगित पर जो भवक उठे
बस ऎसी है हम लोगों की अतिशवाजी.

ऊपर-नीचे दायें-वाएं आगे-पीछे,
उठते-गिरते एरोबेटिक करते विमान
हैं आसमान की छाती पर चिंघाड़ रहे
लेकर अंतर में नन्ही सी बस एक जान.

है चौतरफा छाया अनंत तक गगन एक
बस साथ देश का प्रेम, कर्म, दो-एक याद
कुछ और साथ लेकर आए हैं ये अपने
आदेश, कफ़न, स्नेह और आशीर्वाद.

हर ओर सुरक्षा दीपक में दे प्राण-स्नेह
अपनी छोटी सी आयु बना बाती डाली,
जीवन की आहुति देने को चल पड़े आज
ये वीर जलाने भारत माँ की दीवाली.

ये नहीं अंधेरी रात दीपकों से सज्जित
यह नहीं मात्र त्यौहार मनाये जाने को
यह है अतीत का गर्व, देश का भाल तिलक
ये दीप हार माँ को पहिनाए जाने को.

ये हार कि जिसके दीप-दीप में ज्योति जली
माँ के गुदड़ी के लालों के बलिदानों से,
यह लाली लाख सुहाग समर्पण की प्रतीक
ये बनी बातियाँ हैं राखी के तानो से.

इनमे खुशिओं का मोद, विफलता का प्रलाप
इनमें जलने की शक्ति, जलाने की क्षमता,
इनके अंतर में स्नेह दीप्ति के साथ जलन
इनके दीपन में राह दिखाने की ममता.

इनकी लौ में ऊपर उठने की अमिट चाह
पर इधर-उधर नीचे भी कर देते प्रकाश,
बस यही हमारे भारत का उत्तम प्रतीक
बस यही हमारी एक भविष्यत् की पिपास.

बस यही की आंधी आने पर दे बुझा किन्तु
जब तक जीवन है रवि सी नित्य कला देंगे,
जो करें प्रकाशित विश्व हरें औरों का तम
हम बुझने से पहले लाखों दीप जला देंगे.

बस यही हमारी दीवाली का है परिचय
इसको इक रश्म समझ कर ही न मना लेना,
पर शश्य श्यामला भारत माँ का समझ गर्व
इसके स्वागत में दिल के द्वार सजा लेना.

हम दूर, बहुत ही दूर, हिमालय में बैठे
अपने कर्त्तव्य प्रदीप असंख्य बना लेंगे,
हम सब को भूल मनावें दीपावली आप,
हम भी दीवाली अपनी यहाँ मना लेंगे.

हों आप सुखी, हो लोक सुखी, हों सुखी सभी,
शुभ सब को सब की मुश्कानों की लाली हो,
हर दीप-दीप में सौख्य दीप्ति जल उठे स्वयं,
हे देव! आपको शुभ आगम दीवाली हो.




यदुराज सिंह बैस.
(कविता लिखने की तिथि : १९ अक्टूबर १९६६)



Monday, 1 July 2013

पानी (पानी ने विसार दी अपने वैभव की कहानी)




पानी


एक सागर
सागर में गागर
गागर में पानी
पानी ने विसार दी
अपने वैभव की कहानी
हो गया गागर
खो गया सागर

गागर के रंग रंगा पानी का रंग
गागर का अंग बना पानी का अंग
गागर का नाम हुआ पानी का नाम
गागर का काम हुआ पानी का काम

गागर की श्रेष्ठता
या फिर औकात
पानी का बनी धर्म
रूप, रंग, जात

दोनों मिल एक बने
एक से अनेक बने
कुनवें कबीले बने
गड्ढे और टीले बने
पेड़ में पात हुए
और मुक्के-लात हुए

एक अंधा बन्दर
गागर के अन्दर
मचाए उत्पात
और हुई शुरूआत
रोने और हँसने की
मायाजाल रचने की
और उसमें फसने की
कीचड़ बनाने की
कीचड़ में धंसने की
अहंकार पांव फैलाने लगा
कर्ता और भोक्ता बन गाने लगा
तू-तू और मैं-मैं में रार हुई
द्वंदों की रार ही संसार हुई

और तब एक दिन
गागर टिघल गई
सपने निगल गई
गागर का अस्तित्व
आरोपित व्यक्तित्व
सब का सब खो गया
अन्दर का पानी भी
सागर में मिल कर
फिर सागर हो गया



यदुराज सिंह बैस




नया मोड़ (जिंदगी में फिर नई रौनक जगी है.)



नया मोड़


जिंदगी में फिर नई रौनक जगी है.


हर समय छाई निराशा की घनाली
त्याग कर के नयन औचक सी भगी है.
जिंदगी में फिर नई रौनक जगी है.


होठ जिन पर मरण की ही बोलियाँ थीं,
अब वरण की लगे हैं कहने कहानी.
हर दिशा में लुटी कुंठित भावना भी,
चहक उट्ठी समय से पा कर जवानी.

भुला कर के वेदना सदियों पुरानी
नए सपनों में पुनः आँखें लगी हैं
जिंदगी में फिर नई रौनक जगी है.


छली चाहत भी न आहत कर सकी है,
डगमगाए कदम क्यों कि संभल चुके हैं.
ह्रदय में विश्वास का दरिया बहाने-
स्नेह-घन मन में बरसने चल चुके हैं.

नयन में फिर छा गए अभिनव नज़ारे,
इन्द्रधनुषी रंगों नें दुनिया रंगी है.
जिंदगी में फिर नई रौनक जगी है.


हर चमन को एक दिन पतझड़ सताता,
छोड़ जाते पीत-पात प्रसून सारे;
भूल कर बरवादियों के वे नज़ारे,
क्यों न महकें फिर वही उपवन हमारे?

चौंक कर उड़ जाएगी सारी खुमारी,
स्वप्न में आभास की गोली दगी है.
जिंदगी में फिर नई रौनक जगी है.



                  यदुराज सिंह बैस



Saturday, 29 June 2013

मच्छर (थप्पड़ पड़ा मर गया. बिना कष्ट तर गया.)

मच्छर


गाल पर आ बैठा

खून पीने के लिए,
रही होगी चाहत-
और जीने के लिए.
थप्पड़ पड़ा मर गया.
बिना कष्ट तर गया.

उसे-
न रोगों ने जकड़ा,
न खटिया ने पकड़ा,
न हाथ-पाँव रगड़े,
न घाव हुए तगड़े,
न खांसी, न खों खों,
न कोई लबड़घोंघों,
न दिल ने दिया झटका,
न सिर कहीं पटका,
न दौरे की दहशत,
न मिर्गी मशक्कत,
न लकवे ने मारा,
न लुटा-पिटा-हारा,
न साँसों की गड़बड़,
न प्राणों की भगदड़,
न घिसटा, न रोया,
न आपा ही खोया,
बस, पड़ा एक थप्पड़,
और ख़त्म सब पच्चड़!
प्रश्न है की क्या हुआ?
अच्छा या बुरा हुआ?


यदुराज सिंह बैस




Friday, 28 June 2013

कौन है जो पास आता जा रहा है,




               कौन है?




कौन है जो  पास  आता जा रहा है,
प्यार की धुन गुनगुनाता जा रहा है.

जिंदगी से  यह  बियावाँ  हट रहा है,
धुंद का साम्राज्य भी अब छट रहा है,
स्वांस तक अवरुद्ध थी जिसकी वजह से-
बेबसी  का  वही  बंधन  कट रहा है.

अभी तक ठगता रहा हर मोड़ पर जो,
वह समय भी गले मिलाने आ रहा है.
कौन है जो  पास  आता जा  रहा है,
प्यार की धुन गुनगुनाता जा  रहा है.


मौन के  उस छोर  से बंसी बजता,
कंटकों की राह पर कलियाँ सजाता,
कौन है  जो चाँदनी  ले  हाथ में-
बादलों की ओट से  जादू दिखाता.

कौंधियाती आँख की पुतली के पीछे
सुनहरे  सपने  सजाता  जा रहा है
कौन है जो  पास  आता जा रहा है,
प्यार की धुन गुनगुनाता जा रहा है.


वह ख़ुशी-आनंद भी, अधिकार भी है,
वह नदी की धार भी, पतवार भी है,
अगम जल के भंवर का आधार भी है-
डूबने के  बाद का  उपहार  भी है.

उस ख़ुशी को व्यक्त करती मूक भाषा
में  लिखी  गीता  सुनाता  जा रहा है.
कौन है जो  पास  आता   जा रहा है,
प्यार की धुन  गुनगुनाता  जा रहा है.



               यदुराज सिंह बैस




यदुराज सिंह बैस

उद्बोधन हार हुई तो बढ़ इसका सत्कार करो A Poem of Encouragement




उद्बोधन




हार हुई तो बढ़ इसका सत्कार करो
भिड़ने वाले ही तो इसको पाते हैं .
जो गिरा हुआ है स्वयं, गिरेगा क्या आगे
हाँ, कभी कभी उठने वाले गिर जाते हैं.


हार जीत  तो भिड़ने का  परिणाम है,
इसमें  भई रोने धोने का क्या काम है.
गिर कर ही उठने की ताकत मिलती है
क्रियाशील  के  आगे  कहाँ  विराम है.

चोटें तो  लगती ही रहती हैं  साथी
जब बढ़ने वाले आगे कदम बढ़ाते हैं.
जो गिरा हुआ है स्वयं, गिरेगा क्या आगे
हाँ, कभी कभी उठने वाले गिर जाते हैं.


भिड़ने वालों की यह धैर्य परीक्षा है,
हार समझ कर इसे न धोका खा जाना.
ठोकरें राह को परिभाषित करती हैं,
सरल नहीं होता मंजिल का पाजाना.

अवरोधों  का  डर  न  उनको  होता  है,
जो आगे बढ़ना अपना लक्ष्य बनाते हैं.
            जो गिरा हुआ है स्वयं, गिरेगा क्या आगे
हाँ, कभी कभी उठने वाले गिर जाते हैं.


समय बड़ा ही  निर्मम  होता है साथी
दया दिखाना इसे न बिलकुल भाता है
छुईमुई   के   दुर्बल   पत्तों  से   पूछो -
जिन पर भी पतझड़ का मौसम आता है

               उन गाँधी की भी छाती में बिधती  गोली
               जो सत्य अहिंसा प्रेम शांति सिखलाते हैं
जो गिरा हुआ है स्वयं, गिरेगा क्या आगे
हाँ, कभी कभी  उठने वाले  गिर  जाते हैं.


                        यदुराज सिंह बैस







Thursday, 27 June 2013

अजीव कहानी




अजीव कहानी


नानी!
तेरी कहानी
बड़ी ही विचित्र है,
इसमें -
न कोई शत्रु है,
न कोई मित्र है,
कागज़ के गंध हीन फूल,
लोगों के सीने में शूल,
धरती वीरान,
शंकित इंसान,
तपती हुई रेत,
सूखे हुए खेत,
कहीं नहीं पानी,
यह भी है कोई कहानी?

भाषा समर्थ नहीं.
शब्द हैं अर्थ नहीं.

चारों ओर-
शोर ही शोर,
भीड़ भरे रास्ते,
किसके वास्ते-
उद्वेलित हो रहे?
आपा खो रहे?
न कोई राजा,
न कोई रानी,
नानी,
समझ में न आती
ऎसी कहानी.

बात यों भी अजीव है,
कि हर किसी के कंधे पर-
लदी एक सलीब है,
उल्लुओं की बस्ती है,
मौत यहाँ सस्ती है,
कहाँ गयी भेड़-
जिसे भेड़ियों के झुन्ड
रहे हैं खदेड़?
न कोई ज्ञानी,
न अज्ञानी,
कैसी अजीब कहानी?
नानी?


यदुराज सिंह 


यदुराज सिंह